महाभारत 3.262.34
तत्र त्वं वरनारीषु शोभिष्यसि मया सहभार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम्
tatra tvaṃ varanārīṣu śobhiṣyasi mayā sahabhāryā me bhava suśroṇi tāpasaṃ tyaja rāghavam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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