महाभारत 3.263.12मृगरूपधरेणाथ रक्षसा सोऽपकर्षणम्भ्रातुरागमनं चैव चिन्तयन्पर्यतप्यतmṛgarūpadhareṇātha rakṣasā so'pakarṣaṇambhrāturāgamanaṃ caiva cintayanparyatapyataइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें