महाभारत 3.263.1
मार्कण्डेय उवाच · mārkaṇḍeya uvāca
सखा दशरथस्यासीज्जटायुररुणात्मजःगृध्रराजो महावीर्यः संपातिर्यस्य सोदरः
sakhā daśarathasyāsījjaṭāyuraruṇātmajaḥgṛdhrarājo mahāvīryaḥ saṃpātiryasya sodaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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