महाभारत 3.263.8
सा ददर्श गिरिप्रस्थे पञ्च वानरपुंगवान्तत्र वासो महद्दिव्यमुत्ससर्ज मनस्विनी
sā dadarśa giriprasthe pañca vānarapuṃgavāntatra vāso mahaddivyamutsasarja manasvinī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें