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महाभारत 3.264.52
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा राक्षस्यस्ताः खरस्वनाःआख्यातुं राक्षसेन्द्राय जग्मुस्तत्सर्वमादितः
tasyāstadvacanaṃ śrutvā rākṣasyastāḥ kharasvanāḥākhyātuṃ rākṣasendrāya jagmustatsarvamāditaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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