महाभारत 3.264.8
निषेव्य वारि पम्पायास्तर्पयित्वा पितॄनपिप्रतस्थतुरुभौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ
niṣevya vāri pampāyāstarpayitvā pitṝnapipratasthaturubhau vīrau bhrātarau rāmalakṣmaṇau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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