महाभारत 3.265.3देवदानवगन्धर्वयक्षकिंपुरुषैर्युधिअजितोऽशोकवनिकां ययौ कन्दर्पमोहितःdevadānavagandharvayakṣakiṃpuruṣairyudhiajito'śokavanikāṃ yayau kandarpamohitaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें