महाभारत 3.265.7
स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतःइदमित्यब्रवीद्बालां त्रस्तां रौहीमिवाबलाम्
sa tāmāmantrya suśroṇīṃ puṣpaketuśarāhataḥidamityabravīdbālāṃ trastāṃ rauhīmivābalām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें