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महाभारत 3.266.4
प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मनाःसीतां संस्मृत्य धर्मात्मा रुद्धां राक्षसवेश्मनि
prabhāte lakṣmaṇaṃ vīramabhyabhāṣata durmanāḥsītāṃ saṃsmṛtya dharmātmā ruddhāṃ rākṣasaveśmani
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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