महाभारत 3.266.55
दृष्टा पारे समुद्रस्य त्रिकूटगिरिकन्दरेभवित्री तत्र वैदेही न मेऽस्त्यत्र विचारणा
dṛṣṭā pāre samudrasya trikūṭagirikandarebhavitrī tatra vaidehī na me'styatra vicāraṇā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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