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महाभारत 3.267.26
केचिन्नौभिर्व्यवस्यन्ति केचिच्च विविधैः प्लवैःनेति रामश्च तान्सर्वान्सान्त्वयन्प्रत्यभाषत
kecinnaubhirvyavasyanti kecicca vividhaiḥ plavaiḥneti rāmaśca tānsarvānsāntvayanpratyabhāṣata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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