महाभारत 3.267.3कोटीशतवृतौ चापि गजो गवय एव चवानरेन्द्रौ महावीर्यौ पृथक्पृथगदृश्यताम्koṭīśatavṛtau cāpi gajo gavaya eva cavānarendrau mahāvīryau pṛthakpṛthagadṛśyatāmइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें