महाभारत 3.267.5गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनःकोटीसहस्रमुग्राणां हरीणां समकर्षतgandhamādanavāsī tu prathito gandhamādanaḥkoṭīsahasramugrāṇāṃ harīṇāṃ samakarṣataइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें