महाभारत 3.267.7
श्रीमान्दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽपि वीर्यवान्प्रचकर्ष महत्सैन्यं हरीणां भीमतेजसाम्
śrīmāndadhimukho nāma harivṛddho'pi vīryavānpracakarṣa mahatsainyaṃ harīṇāṃ bhīmatejasām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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