महाभारत 3.268.7
अङ्गदस्त्वथ लङ्काया द्वारदेशमुपागतःविदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः
aṅgadastvatha laṅkāyā dvāradeśamupāgataḥvidito rākṣasendrasya praviveśa gatavyathaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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