महाभारत 3.272.2
पुत्रमिन्द्रजितं शूरं रावणः प्रत्यभाषतजहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम्
putramindrajitaṃ śūraṃ rāvaṇaḥ pratyabhāṣatajahi rāmamamitraghna sugrīvaṃ ca salakṣmaṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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