महाभारत 3.273.32
एवं बहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदाक्रुद्धं संशमयामास जगृहे च स तद्वचः
evaṃ bahuvidhairvākyairavindhyo rāvaṇaṃ tadākruddhaṃ saṃśamayāmāsa jagṛhe ca sa tadvacaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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