महाभारत 3.275.66
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम्विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद्गृहान्प्रति
so'bhiṣiktaḥ kapiśreṣṭhaṃ sugrīvaṃ sasuhṛjjanamvibhīṣaṇaṃ ca paulastyamanvajānādgṛhānprati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें