महाभारत 3.277.38
साभिवाद्य पितुः पादौ व्रीडितेव मनस्विनीपितुर्वचनमाज्ञाय निर्जगामाविचारितम्
sābhivādya pituḥ pādau vrīḍiteva manasvinīpiturvacanamājñāya nirjagāmāvicāritam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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