महाभारत 3.277.7
क्षमावाननपत्यश्च सत्यवाग्विजितेन्द्रियःअतिक्रान्तेन वयसा संतापमुपजग्मिवान्
kṣamāvānanapatyaśca satyavāgvijitendriyaḥatikrāntena vayasā saṃtāpamupajagmivān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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