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महाभारत 3.28.32
द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनःमां ते वनगतां दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते
drupadasya kule jātāṃ snuṣāṃ pāṇḍormahātmanaḥmāṃ te vanagatāṃ dṛṣṭvā kasmānmanyurna vardhate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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