महाभारत 3.281.103
कृत्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्बिनम्गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशं पुनरागमत्
kṛtvā kaṭhinabhāraṃ sā vṛkṣaśākhāvalambinamgṛhītvā paraśuṃ bhartuḥ sakāśaṃ punarāgamat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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