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महाभारत 3.281.105
सत्यवानुवाचअभ्यासगमनाद्भीरु पन्थानो विदिता ममवृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये
satyavānuvācaabhyāsagamanādbhīru panthāno viditā mamavṛkṣāntarālokitayā jyotsnayā cāpi lakṣaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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