महाभारत 3.281.71
तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहतेश्वस्ते सर्वं यथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज
tamuvācātha sāvitrī rajanī vyavagāhateśvaste sarvaṃ yathāvṛttamākhyāsyāmi nṛpātmaja
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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