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महाभारत 3.281.75
सत्यवानुवाचवनं प्रतिभयाकारं घनेन तमसा वृतम्न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि
satyavānuvācavanaṃ pratibhayākāraṃ ghanena tamasā vṛtamna vijñāsyasi panthānaṃ gantuṃ caiva na śakṣyasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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