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महाभारत 3.284.20
अमृतादुत्थितं ह्येतदुभयं रत्नसंभवम्तस्माद्रक्ष्यं त्वया कर्ण जीवितं चेत्प्रियं तव
amṛtādutthitaṃ hyetadubhayaṃ ratnasaṃbhavamtasmādrakṣyaṃ tvayā karṇa jīvitaṃ cetpriyaṃ tava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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