महाभारत 3.285.8
अस्ति चात्र परं किंचिदध्यात्मं देवनिर्मितम्अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत्क्रियतामविशङ्कया
asti cātra paraṃ kiṃcidadhyātmaṃ devanirmitamataśca tvāṃ bravīmyetatkriyatāmaviśaṅkayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें