महाभारत 3.288.9
अपराधे हि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाःभवन्ति च्यवनो यद्वत्सुकन्यायाः कृते पुरा
aparādhe hi rājendra rājñāmaśreyase dvijāḥbhavanti cyavano yadvatsukanyāyāḥ kṛte purā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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