महाभारत 3.289.2
प्रातरायास्य इत्युक्त्वा कदाचिद्द्विजसत्तमःतत आयाति राजेन्द्र साये रात्रावथो पुनः
prātarāyāsya ityuktvā kadāciddvijasattamaḥtata āyāti rājendra sāye rātrāvatho punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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