महाभारत 3.289.6
व्यस्ते काले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विजःदुर्लभ्यमपि चैवान्नं दीयतामिति सोऽब्रवीत्
vyaste kāle punaścaiti na caiti bahuśo dvijaḥdurlabhyamapi caivānnaṃ dīyatāmiti so'bravīt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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