महाभारत 3.289.7
कृतमेव च तत्सर्वं पृथा तस्मै न्यवेदयत्शिष्यवत्पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंयता
kṛtameva ca tatsarvaṃ pṛthā tasmai nyavedayatśiṣyavatputravaccaiva svasṛvacca susaṃyatā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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