महाभारत 3.290.7प्राणानुपस्पृश्य तदा आजुहाव दिवाकरम्आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरःprāṇānupaspṛśya tadā ājuhāva divākaramājagāma tato rājaṃstvaramāṇo divākaraḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें