Loading
महाभारत 3.294.34
कर्ण उवाच · karṇa uvāca
संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम्यथा मामात्थ शक्र त्वं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते
saṃśayaṃ paramaṃ prāpya vimokṣye vāsavīmimāmyathā māmāttha śakra tvaṃ satyametadbravīmi te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें