महाभारत 3.296.21
एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुःआमुक्तखड्गो मेधावी तत्सरः प्रत्यपद्यत
evamukto guḍākeśaḥ pragṛhya saśaraṃ dhanuḥāmuktakhaḍgo medhāvī tatsaraḥ pratyapadyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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