महाभारत 3.296.40
अपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम्रुरुभिश्च वराहैश्च पक्षिभिश्च निषेवितम्
apetajananirghoṣaṃ praviveśa mahāvanamrurubhiśca varāhaiśca pakṣibhiśca niṣevitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें