महाभारत 3.297.35
युधिष्ठिर उवाच · yudhiṣṭhira uvāca
प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुःवागेका वृश्चते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते
prāṇo vai yajñiyaṃ sāma mano vai yajñiyaṃ yajuḥvāgekā vṛścate yajñaṃ tāṃ yajño nātivartate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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