महाभारत 3.298.23
जयेयं लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभोदाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत्
jayeyaṃ lobhamohau ca krodhaṃ cāhaṃ sadā vibhodāne tapasi satye ca mano me satataṃ bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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