महाभारत 3.30.8
तं क्रोधं वर्जितं धीरैः कथमस्मद्विधश्चरेत्एतद्द्रौपदि संधाय न मे मन्युः प्रवर्धते
taṃ krodhaṃ varjitaṃ dhīraiḥ kathamasmadvidhaścaretetaddraupadi saṃdhāya na me manyuḥ pravardhate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें