महाभारत 3.31.16
अश्वमेधो राजसूयः पुण्डरीकोऽथ गोसवःएतैरपि महायज्ञैरिष्टं ते भूरिदक्षिणैः
aśvamedho rājasūyaḥ puṇḍarīko'tha gosavaḥetairapi mahāyajñairiṣṭaṃ te bhūridakṣiṇaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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