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महाभारत 3.33.1
द्रौपद्युवाचनावमन्ये न गर्हे च धर्मं पार्थ कथंचनईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम्
draupadyuvācanāvamanye na garhe ca dharmaṃ pārtha kathaṃcanaīśvaraṃ kuta evāhamavamaṃsye prajāpatim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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