Loading
महाभारत 3.33.44
पृथिवीं लाङ्गलेनैव भित्त्वा बीजं वपत्युतआस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम्
pṛthivīṃ lāṅgalenaiva bhittvā bījaṃ vapatyutaāste'tha karṣakastūṣṇīṃ parjanyastatra kāraṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें