महाभारत 3.33.45
वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीयादनेनास्तत्र कर्षकःयदन्यः पुरुषः कुर्यात्कृतं तत्सकलं मया
vṛṣṭiścennānugṛhṇīyādanenāstatra karṣakaḥyadanyaḥ puruṣaḥ kuryātkṛtaṃ tatsakalaṃ mayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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