महाभारत 3.33.55
एवं संस्थितिका सिद्धिरियं लोकस्य भारतचित्रा सिद्धिगतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागतः
evaṃ saṃsthitikā siddhiriyaṃ lokasya bhāratacitrā siddhigatiḥ proktā kālāvasthāvibhāgataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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