महाभारत 3.34.45
दानं यज्ञः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम्एष धर्मः परो राजन्फलवान्प्रेत्य चेह च
dānaṃ yajñaḥ satāṃ pūjā vedadhāraṇamārjavameṣa dharmaḥ paro rājanphalavānpretya ceha ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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