महाभारत 3.34.46
एष नार्थविहीनेन शक्यो राजन्निषेवितुम्अखिलाः पुरुषव्याघ्र गुणाः स्युर्यद्यपीतरे
eṣa nārthavihīnena śakyo rājanniṣevitumakhilāḥ puruṣavyāghra guṇāḥ syuryadyapītare
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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