महाभारत 3.34.56
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चनपार्थिवो व्यजयद्राजन्न भूतिं न पुनः श्रियम्
na hi kevaladharmātmā pṛthivīṃ jātu kaścanapārthivo vyajayadrājanna bhūtiṃ na punaḥ śriyam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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