महाभारत 3.34.85
सृञ्जयैः सह कैकेयैर्वृष्णीनामृषभेण चकथं स्विद्युधि कौन्तेय राज्यं न प्राप्नुयामहे
sṛñjayaiḥ saha kaikeyairvṛṣṇīnāmṛṣabheṇa cakathaṃ svidyudhi kaunteya rājyaṃ na prāpnuyāmahe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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