महाभारत 3.34.8
भवतः प्रियमित्येवं महद्व्यसनमीदृशम्धर्मकामे प्रतीतस्य प्रतिपन्नाः स्म भारत
bhavataḥ priyamityevaṃ mahadvyasanamīdṛśamdharmakāme pratītasya pratipannāḥ sma bhārata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें