महाभारत 3.40.56
स जानुभ्यां महीं गत्वा शिरसा प्रणिपत्य चप्रसादयामास हरं पार्थः परपुरंजयः
sa jānubhyāṃ mahīṃ gatvā śirasā praṇipatya caprasādayāmāsa haraṃ pārthaḥ parapuraṃjayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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