महाभारत 3.42.3
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मया त्र्यम्बको हरःपिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना
dhanyo'smyanugṛhīto'smi yanmayā tryambako haraḥpinākī varado rūpī dṛṣṭaḥ spṛṣṭaśca pāṇinā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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